बृहत्त्रयी में निहित राष्ट्रीय भावना
Abstract
अपने राष्ट्र की भूमि, जनसमूह, संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, धर्म, कला, राजनीति जीवन दर्शन आदि के प्रति लोगों के मन में गरिमा तथा महिमा का जो स्वाभविक गर्व होता है, उसे ही हम राष्ट्रीय भावना की संज्ञा देते है। इसके साथ ही राष्ट्र की संस्कृति सम्पदा के केन्द्र, वन, पर्वत, नदी आदि के प्रति अथाह प्रेम गौरव तथा आत्मीयता का भाव ही देशभक्ति है। संस्कृत भाषा की व्याकरण की प्रकृति एवं प्रक्रिया के अनुसार विचार करने से स्पष्ट कि राष्ट्र शब्द की निष्पत्ति दीप्त्यर्थक धातु ‘‘राज्’’ से हुई है, जिसमें औैणादिक ‘‘ष्ट्रन्’’ प्रत्यय जोड़ा गया है। प्राचीन संस्कृत साहित्य का स्वाध्याय करते समय मन तथा बुद्धि में यह तथ्य बड़ी तीव्रता से प्रकाशित होता है कि प्राचीन संस्कृत साहित्यकारों में भी अनेक ऐसे साहित्यकार हुए हैं, जिनकी रचनाओं में राष्ट्रीय भावना की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती है।
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