चिपको आंदोलन: एक समीक्षा

Authors

  • डॉ. विजय बहुगुणा Author
  • डॉ. राकेश लाल शाह Author
  • डॉ. आशाराम बिजल्वाण Author

Abstract

चिपको आंदोलन १९७० के दशक का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पर्यावरणीय आंदोलन था,जिसने न केवल भारत में वनों के संरक्षण की दिशा को बदला बल्कि वैश्विक स्तर  पर ग्रासरुट एनवीरोटिलिस्म की मिसाल भी पेश की,यह आंदोलन उत्तराखंड के चमोली और टिहरी जिलों में स्थानीय समुदायों विशेषकर महिलाओं द्वारा संचालित हुआ.इसका प्रमुख स्वरुप था -पेड़ों से चिपककर वनों को ठेकेदारों से बचाना।दरअसल १९६० -७० के दशक में हिमालयी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक लकड़ी कटान,सड़क निर्माण और खनन ने पर्यावरणीय असंतुलन पैदा किया।स्थानीय लोग ईंधन,चारा ,जल श्रोत और कृषि उत्पादन के लिए जंगलों पर निर्भर थे -सीधे प्रभावित हुए। १९७३ में रेणी गाँव (चमोली जनपद ) गौरा देवी और ग्रामीण महिलाओं द्वारा आरम्भ किया गया, प्रतिरोध चिपको आंदोलन का प्रतीक बन गया।हिमालयी क्षेत्रों में वन सम्पदा का तेज़ी से शोषण बढ़ा.सड़कनिर्माण ,खनन  और व्यावसायिक लकड़ी कटान ने पर्यावरणीय   संकट पैदा किये।मसलन -भूस्खलन,जलश्रोतों का सूखना,पशुचारे की कमी,तथा खेती पर प्रतिकूल प्रभाव आदि  का गतिविधियों से सम्बंधित वनों पर प्रत्यक्ष निर्भरता रखने वाले ग्रामीणों ने इसे अपनी आजीविका लिए संकट के रूप में देखा -इसी सन्दर्भ में चिपको जैसी चेतना विकसित हुई।

Author Biographies

  • डॉ. विजय बहुगुणा

    असिस्टेंट प्रोफेसर, इतिहास विभाग,वीर शहीद केसरी चंद राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डाकपत्थर (विकासनगर) देहरादून, उत्तराखंड

  • डॉ. राकेश लाल शाह

    एसोसिएट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, डी.ए.वी. देहरादून

  • डॉ. आशाराम बिजल्वाण

    एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, राजकीय महाविद्यालय मोरी, उत्तरकाशी

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Published

16-12-2025

How to Cite

चिपको आंदोलन: एक समीक्षा. (2025). Siddhanta’s International Journal of Advanced Research in Arts & Humanities, 269-278. https://sijarah.com/index.php/sijarah/article/view/212