भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन और उत्तरी बिहार की दलित एवं पिछड़ी जातियों का सामाजिक परिवर्तन

Authors

  • पूजा कुमारी Author

Keywords:

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन, उत्तरी बिहार, दलित, पिछड़ी जातियाँ, सामाजिक परिवर्तन, जातीय चेतना, सामाजिक न्याय, राजनीतिक सहभागिता।

Abstract

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन केवल औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक स्वतंत्रता का संघर्ष नहीं था, बल्कि इसने भारतीय समाज में व्यापक सामाजिक, वैचारिक और राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं को भी गति प्रदान की। विशेषतः उत्तरी बिहार की दलित एवं पिछड़ी जातियों के संदर्भ में यह आन्दोलन सामाजिक चेतना, राजनीतिक सहभागिता और आत्मसम्मान के विकास का एक महत्वपूर्ण माध्यम सिद्ध हुआ। प्रस्तुत शोध लेख का उद्देश्य यह विश्लेषण करना है कि भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन ने उत्तरी बिहार की दलित एवं पिछड़ी जातियों के सामाजिक परिवर्तन को किस प्रकार प्रभावित किया तथा इस परिवर्तन की प्रकृति, सीमा और ऐतिहासिक महत्ता क्या रही।

यह अध्ययन ऐतिहासिक एवं विश्लेषणात्मक शोध पद्धति पर आधारित है, जिसमें प्रकाशित पुस्तकों, शोध लेखों, सरकारी अभिलेखों तथा द्वितीयक स्रोतों का समालोचनात्मक अध्ययन किया गया है। शोध से स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक काल में उत्तरी बिहार की सामाजिक संरचना गहरी जातिगत असमानताओं, भूमि पर उच्च जातियों के प्रभुत्व तथा शिक्षा एवं संसाधनों तक सीमित पहुँच से प्रभावित थी। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान महात्मा गांधी द्वारा अस्पृश्यता उन्मूलन, रचनात्मक कार्यक्रमों तथा ग्राम-आधारित जनसंगठन पर दिए गए बल ने दलित एवं पिछड़े वर्गों में सामाजिक चेतना को सुदृढ़ किया। इसके साथ ही किसान आंदोलनों, स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व तथा राष्ट्रीय आंदोलनों में सहभागिता ने इन समुदायों के भीतर आत्मविश्वास, संगठन क्षमता और अधिकारों के प्रति जागरूकता को बढ़ाया (जाफ्रेलो, 2003)।

अध्ययन यह भी इंगित करता है कि सामाजिक परिवर्तन एक समान या तात्कालिक प्रक्रिया नहीं थी। अनेक क्षेत्रों में पारंपरिक जातिगत संरचनाएँ और सामाजिक वर्चस्व स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी विद्यमान रहे, किन्तु राष्ट्रीय आन्दोलन ने इन समुदायों को सार्वजनिक जीवन, शिक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर सक्रिय हस्तक्षेप करने का आधार प्रदान किया। स्वतंत्रता के पश्चात संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा सामाजिक न्याय संबंधी नीतियों ने इस परिवर्तन को संस्थागत स्वरूप प्रदान किया, जिससे दलित एवं पिछड़ी जातियों की सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति में क्रमिक सुधार संभव हुआ (ओम्वेट, 1994)।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन ने उत्तरी बिहार की दलित एवं पिछड़ी जातियों के सामाजिक परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रक्रिया को गति प्रदान की। यह परिवर्तन केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक समानता, नागरिक अधिकारों, राजनीतिक सहभागिता और सामाजिक गतिशीलता की दिशा में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक आधार भी बना। यह अध्ययन क्षेत्रीय इतिहास और सामाजिक परिवर्तन के अंतर्संबंधों को समझने में उपयोगी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

Author Biography

  • पूजा कुमारी

    शोधार्थी, इतिहास विभाग, मुंगेर विश्वविद्यालय, मुंगेर

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Published

29-06-2026

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Articles

How to Cite

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन और उत्तरी बिहार की दलित एवं पिछड़ी जातियों का सामाजिक परिवर्तन. (2026). Siddhanta’s International Journal of Advanced Research in Arts & Humanities, 167-176. https://sijarah.com/index.php/sijarah/article/view/313