मार्क्सवादी आलोचना के परिप्रेक्ष्य में डाॅ. नामवर सिंह

Authors

  • डाॅ. श्रवण कुमार Author

Keywords:

मार्क्सवादी आलोचना, डाॅ. नामवर सिंह

Abstract

नामवर सिंह माक्र्सवाद के अनुकूल व्यवहार करके भी आलोचना में ‘वास्तविकता’ के नजदीक का दृष्टिकोण रखते हैं। ‘लेखक’ से ज्यादा एक ‘वाचक’ के रूप से सन्तुष्ट डाॅ. नामवर सिंह के लिए माक्र्सवादी वैचारिक दृष्टि उनकी आलोचना पद्धति को और ज्यादा पठनीय, संवादपरक और विचारोत्तेजक बनाने में सहायक रही है। आलोचना पद्धति का यह भी वैषिष्ट है कि वे उदार माक्र्सवादी हैं, उनके प्रिय आलोचक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का गैर माक्र्सवादी होना इसका साक्षात प्रमाण है। ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंष का योगदान’ और ‘संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो’ नामवर सिंह द्वारा लिखित उनकी प्रथम दोनों कृतियां, संपादन, इतिहास और षोधकार्य से जुडी़ हुई हैं। इनमें निहित विचार, टिप्पणियाँ, लेखन की सूक्ष्मता, सहृदयता, माक्र्सवादी चिन्तन के प्रति उनकी समझ और आलोचक की दषा-दिषा को स्पष्ट करती है।’’ उनकी हिन्दी साहित्य के इतिहास को एक नवीन दृष्टि, माक्र्सवादी दृष्टि को देखने समझने की षुरूआत यहीं से हो जाती है। 

Author Biography

  • डाॅ. श्रवण कुमार

    असिस्टेंट प्रोफेसर - हिन्दी विभाग, राजकीय महाविद्यालय चैबट्टाखाल, पौडी गढवाल, उत्तराखंड

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Published

10-12-2023

How to Cite

मार्क्सवादी आलोचना के परिप्रेक्ष्य में डाॅ. नामवर सिंह. (2023). Siddhanta’s International Journal of Advanced Research in Arts & Humanities, 71-76. https://sijarah.com/index.php/sijarah/article/view/267

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