वैराग्यवीरचरित महाकाव्य का दार्शनिक एवं सामाजिक चिंतन
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वैराग्यवीरचरित महाकाव्य, दार्शनिक, सामाजिक चिंतनAbstract
इस संसार में मनुष्य को जीवन की वास्तविकता को समझने के लिए, सांसारिक आसक्तियों का त्याग करना पड़ता है तथा आत्म- साक्षात्कार के मार्ग पर चलकर ही दार्शनिक चिंतन की ओर अग्रसर हो सकता है। वैराग्य-जिसे त्याग के रूप में भी जाना जाता है। "वैराग्य का अर्थ मन की एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति भौतिक सुख और इच्छाओं से मुक्त हो जाता है। इसमें जीवन की क्षणभंगुरता तथा सांसारिक सुखों के बारे में कवि की गहरी समझ को प्रदर्शित करता है। यह ग्रन्थ काव्यात्मक अभिव्यक्ति से परिपूर्ण है, जिसमें जीवन की नश्वरता, मृत्यु की अनिवार्यता और भौतिक सुखों से लिप्त रहने के लिए, इसकी निरर्थकता को दर्शाने के लिए इसका दार्शनिक चिंतन किया गया है।
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