सामाजिक न्याय के क्षेत्र में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर और महात्मा गांधी के विचारों का तुलनात्मक विश्लेषण

Authors

  • सुदर्शन कुमार प्रियदर्शी Author

Keywords:

सामाजिक न्याय, डॉ. भीमराव अंबेडकर, महात्मा गांधी, अस्पृश्यता, जातिवाद, कानूनी सुधार, नैतिक सुधार, समानता, शिक्षा, राजनीतिक अधिकार, आर्थिक सशक्तिकरण, ग्रामीण विकास, सत्याग्रह, अहिंसा।

Abstract

सामाजिक न्याय एक ऐसा मूलभूत सिद्धांत है जो समाज में समानता, मानवाधिकारों और अवसरों के समान वितरण को सुनिश्चित करता है। भारत जैसे विविधता-पूर्ण देश में सामाजिक असमानताएँ, जातिवाद और अस्पृश्यता जैसे प्रश्न सदैव चुनौतीपूर्ण रहे हैं। इस संदर्भ में डॉ. भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी के विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं। दोनों महापुरुषों ने सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए अपनी विशिष्ट दृष्टि और कार्यप्रणाली अपनाई, जो एक-दूसरे से भिन्न होने के बावजूद समान उद्देश्य की ओर अग्रसर थी।1

डॉ. अंबेडकर का दृष्टिकोण मुख्यतः कानूनी और संवैधानिक उपायों पर आधारित था। उन्होंने माना कि सामाजिक न्याय तभी सुनिश्चित किया जा सकता है जब समाज में व्याप्त जातिवाद और अस्पृश्यता को कानून के माध्यम से समाप्त किया जाए। उनके अनुसार शिक्षा, राजनीतिक अधिकार और आर्थिक सशक्तिकरण सामाजिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण उपकरण हैं। संविधान निर्माण में उनके योगदान ने न केवल अधिकारों की गारंटी दी बल्कि सामाजिक सुधार की नींव भी रखी। उनके दृष्टिकोण में न्याय का पैमाना वस्तुनिष्ठ और संस्थागत था, जिसमें राज्य और कानून की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।1

वहीं, महात्मा गांधी का दृष्टिकोण नैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सुधारों पर आधारित था। गांधीजी का मानना था कि वास्तविक सामाजिक न्याय तब संभव है जब व्यक्ति अपने नैतिक कर्तव्यों को समझे और समाज में समानता, सहिष्णुता और सहयोग की भावना विकसित हो। उन्होंने हरिजनों के उत्थान, ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भरता को सामाजिक सुधार का प्रमुख साधन माना। गांधीजी ने अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाने की दृष्टि अपनाई, जिसमें व्यक्तिगत नैतिकता और सामूहिक चेतना का विकास केंद्रीय स्थान रखता था।2

अंबेडकर और गांधी दोनों ही अस्पृश्यता और जातिवाद के खिलाफ संघर्ष में अग्रणी रहे, लेकिन उनके दृष्टिकोण में मुख्य अंतर यह था कि अंबेडकर ने संरचनात्मक और कानूनी सुधारों पर जोर दिया, जबकि गांधीजी ने नैतिक और सांस्कृतिक सुधारों के माध्यम से सामाजिक चेतना को जागृत करने का प्रयास किया। इस दृष्टिगत तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि समाज में न्याय और समानता की दिशा में दोनों के प्रयास पूरक हैं। आज भी आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए उनके विचार प्रासंगिक हैं और नीति निर्धारण, सामाजिक आंदोलनों और शिक्षा के क्षेत्र में इनका गहरा प्रभाव देखा जा सकता है।2

यह अध्ययन न केवल उनके दृष्टिकोणों की तुलना करता है, बल्कि यह भी प्रदर्शित करता है कि समाज में न्याय की स्थापना के लिए कानूनी और नैतिक दृष्टिकोणों का संतुलन आवश्यक है। दोनों विचारक समाज में समग्र सुधार की दिशा में प्रेरणा स्रोत हैं और उनकी शिक्षाएँ सामाजिक न्याय की अवधारणा को सशक्त बनाती हैं।

Author Biography

  • सुदर्शन कुमार प्रियदर्शी

    सहायक प्राध्यापक (राजनीति विज्ञान), कोशी कॉलेज, खगड़िया, मुंगेर विश्वविद्यालय (मुंगेर)

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Published

24-02-2025

How to Cite

सामाजिक न्याय के क्षेत्र में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर और महात्मा गांधी के विचारों का तुलनात्मक विश्लेषण. (2025). Siddhanta’s International Journal of Advanced Research in Arts & Humanities, 113-126. https://sijarah.com/index.php/sijarah/article/view/200

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