बस्तर क्षेत्र के दंतेवाड़ा जिला की माड़िया जनजाति के परंपरागत त्यौहार का सामाजिक व सांस्कृतिक महत्ता
Keywords:
बस्तर क्षेत्र, दंतेवाड़ा जिला, माड़िया जनजाति, परंपरागत ज्ञान, त्यौहार, सामाजिक, सांस्कृतिक महत्व, प्रकृति, धार्मिक अनुष्ठान, लोक जीवन, संरक्षण, सामाजिक एकता, सहभागिता, परिवर्तन, देवी-देवता, विश्वास, पुना कुटूम तिंदाना, कुर्मी, कोरता, पेन करसाड, करसाड़, इडू पंडुम/मरका पंडुम, भीमसेन जातरा, विज्जा पंडुम, पेन करसाड।Abstract
माड़िया जनजाति छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर क्षेत्र के सघन वन क्षेत्रों में निवासरत है, जो अपनी विशिष्ट त्यौहारों, सांस्कृतिक परंपराओं एवं रीति-रिवाजों के लिए जानी जाती है। त्यौहारों को दंतेवाड़ा जिला की माड़िया जनजाति गोंडी बोली में ’पंडुम’ कहा जाता है। माड़िया जनजाति के अधिकांश त्यौहार सामान्यतः प्रकृति पूजा पर आधारित होते हैं। जिसे पेड़-पौधे, नदी, पहाड़ व भूमि आदि को देवतुल्य मानकर त्यौहारों में पूर्वजों की पूजा की जाती है और बलि प्रथा भी प्रचलित है। शोध अध्ययन का मुख्य उद्देश्य माड़िया जनजाति के द्वारा आयोजित पारंपरिक त्यौहारों के महत्व एवं उनमें हुए परिवर्तन का विश्लेषणात्मक अध्ययन करना है। इस शोध आलेख बस्तर क्षेत्र के दंतेवाड़ा जिला की माड़िया जनजाति में प्रचलित त्यौहारों की जानकारी क्षेत्रीय कार्य के द्वारा प्राप्त की गई है। यह शोध प्राथमिक तथ्यों पर आधारित है। इसमें उद्देश्यपूर्ण निदर्शन विधि से 50 कुंजी सूचनादाता का चयन कर त्यौहारों से संबंधित जानकारी एकत्रित की गई है। यह अध्ययन क्षेत्रीय कार्य के दौरान लिये गए प्राथमिक तथ्यों पर आधारित है। इनके द्वारा आयोजित त्यौहारों में केवल धार्मिक अनुष्ठानिक क्रियाऐं ही होती हैं, बल्कि अपितु इसमें प्रकृति पर विश्वास तथा इसके प्रति सम्मान, सामाजिक एकता व सहयोग, सांस्कृतिक लोक जीवन और परंपरागत ज्ञान का संरक्षण आदि का समायोजन होता है जो जनजाति पहचान को बनाए रखने की महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।
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