भारतीय वर्णव्यवस्था : स्वरूप, उत्पत्ति एवं प्रमुख सिद्धान्त
Keywords:
वर्णव्यवस्था, चातुर्वर्ण्य, वर्णोत्पत्ति, रंग सिद्धान्त, गुण सिद्धान्त, गुण-कर्म सिद्धान्त, वैदिक परम्पराAbstract
भारतीय ज्ञानपरम्परा में वर्णव्यवस्था एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था के रूप में विकसित हुई। इस व्यवस्था के अन्तर्गत समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चार वर्णों में विभाजित कर उनके कर्तव्यों एवं सामाजिक दायित्वों का निर्धारण किया गया। प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य भारतीय वर्णव्यवस्था के स्वरूप तथा उसकी उत्पत्ति से सम्बद्ध प्रमुख सिद्धान्तों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करना है। शोध में दैवी अथवा परम्परागत सिद्धान्त, रंग सिद्धान्त, गुण सिद्धान्त तथा गुण-कर्म सिद्धान्त का विशेष रूप से विवेचन किया गया है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि प्रारम्भिक भारतीय समाज में वर्णविभाजन का आधार मुख्यतः व्यक्तियों के गुण, प्रवृत्ति और कर्म थे, न कि जन्म। किन्तु समय के साथ यह व्यवस्था क्रमशः जन्माधारित और अपेक्षाकृत कठोर सामाजिक संरचना में परिवर्तित हो गई। अतः यह कहा जा सकता है कि वर्णव्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज में कार्यविभाजन, सामाजिक समन्वय तथा उत्तरदायित्वों का संतुलित वितरण सुनिश्चित करना था, यद्यपि उसके परिवर्तित रूप ने बाद में जातिगत संरचना को भी प्रभावित किया।
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