चुनावों में मुफ्त योजनाओं की राजनीति: लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियाँ
Keywords:
मुफ्त योजनाएँ, फ्रीबी राजनीति, चुनावी लोकतंत्र, राजकोषीय अनुशासन, जनहितकारी राज्य, निर्वाचन आचार संहिता, सर्वोच्च न्यायालय, राज्य समाजवाद, प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद, अंतरण योजनाएँ, पूँजीगत व्यय, राजकोषीय घाटा, आर्थिक स्थिरता, नैतिकता, शासन सुधार।Abstract
भारतीय चुनावी राजनीति में मुफ्त योजनाओं (फ्रीबीज) का बढ़ता चलन लोकतंत्र के समक्ष एक गंभीर आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक चुनौती बन गया है। राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए बिना सोचे-समझे—मुफ्त बिजली, नकद हस्तांतरण, सिलेंडर, घरेलू सामान—जैसे वादे कर रहे हैं, जिससे राज्यों का राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है, पूँजीगत व्यय घट रहा है, और कर्ज का बोझ चिंताजनक स्तर पर पहुँच गया है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, राज्यों द्वारा मुफ्त योजनाओं पर खर्च पाँच गुना बढ़कर 1.7 लाख करोड़ रुपये हो गया है; बिहार जैसे राज्यों का राजकोषीय घाटा 6 प्रतिशत तक पहुँच गया है, और 21 राज्य केंद्र द्वारा निर्धारित 3 प्रतिशत की घाटा सीमा पार कर चुके हैं। इस प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद ने चुनावों को नीतिगत बहस से हटाकर तात्कालिक, दृश्यमान लाभों की नीलामी में बदल दिया है, जिससे दीर्घकालिक बुनियादी ढाँचे और मानव पूंजी के निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने चिंता जताते हुए कहा है कि कहीं हम “परजीवियों का वर्ग” तो नहीं बना रहे, और जनहित याचिकाओं में मुफ्त वादों पर रोक की माँग की गई है। हालाँकि, कल्याणकारी योजनाओं और केवल चुनावी लाभ के लिए दी जाने वाली “रेवड़ी” के बीच की रेखा धुंधली है। समाधान में सशर्त नकद हस्तांतरण, पूर्व-चुनाव अवधि में आचार संहिता को सख्त बनाना, वित्तीय प्रभाव विवरणों का खुलासा अनिवार्य करना, और मतदाताओं में दीर्घकालिक दृष्टि से सोचने की जागरूकता पैदा करना शामिल है। तब तक, फ्रीबी राजनीति लोकतंत्र की नींव और विकासशील भारत के भविष्य दोनों के लिए एक गंभीर खतरा बनी हुई है।
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