संस्कृत साहित्य में नारी विमर्श: एक समीक्षात्मक अध्ययन
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संस्कृत साहित्य, नारी विमर्श, पितृसत्ता, वैदिक स्त्री, महाकाव्य, स्त्री-चरित्र, नारीवाद, कालिदास, धर्मशास्त्र, कवयित्रीAbstract
प्रस्तुत शोध-पत्र संस्कृत साहित्य में नारी विमर्श की अवधारणा का समीक्षात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। वैदिक साहित्य से लेकर महाकाव्यों, शास्त्रीय संस्कृत नाटक-काव्य परंपरा और धर्मशास्त्र साहित्य तक की व्यापक यात्रा करते हुए यह अध्ययन दर्शाता है कि संस्कृत वाङ्मय में नारी की छवि एकरैखिक न होकर बहुआयामी और अंतर्विरोधों से भरी हुई है। वैदिक युग में गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी स्त्रियों की बौद्धिक स्वतंत्रता, महाकाव्यों में सीता, द्रौपदी, गांधारी जैसे जटिल स्त्री-चरित्र, कालिदास, भास, भवभूति और शूद्रक के नाटकों में नारी का सूक्ष्म चित्रण, तथा शीलभट्टारिका एवं गंगादेवी जैसी कवयित्रियों का सृजनात्मक योगदान—इन सबका विश्लेषण करते हुए यह पत्र यह स्थापित करने का प्रयास करता है कि संस्कृत साहित्य में स्त्री-प्रतिरोध, स्त्री-बुद्धि और स्त्री-स्वायत्तता के सशक्त स्वर विद्यमान रहे हैं, भले ही कालांतर में पितृसत्तात्मक संरचनाओं ने उन्हें सीमित किया हो। यह अध्ययन आधुनिक नारीवादी सिद्धांतों की कसौटी पर संस्कृत साहित्य के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल देता है।
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