मुगल स्थापत्य कला पर क्षेत्रीय संस्कृतियों का प्रभाव: अकबर से शाहजहाँ काल तक
Keywords:
मुगल स्थापत्य, फतेहपुर सीकरी, ताजमहल, क्षेत्रीय शैली, सुलह-ए-कुल, पित्रा-दुरा, सांस्कृतिक समन्वयAbstract
मुगल स्थापत्य कला भारतीय उपमहाद्वीप की सर्वाधिक समृद्ध वास्तु-परम्पराओं में से एक मानी जाती है, जिसका विकास किसी एकल सांस्कृतिक धारा से नहीं, बल्कि अनेक क्षेत्रीय शैलियों के गहन समन्वय से हुआ। यह शोध-पत्र अकबर (1556-1605), जहाँगीर (1605-1627) और शाहजहाँ (1628-1658) के शासनकाल में निर्मित प्रमुख स्थापत्य कृतियों का ऐतिहासिक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि राजस्थानी, गुजराती, बंगाली, दक्खिनी तथा फारसी-तैमूरी परम्पराओं ने मुगल भवन-निर्माण को किस प्रकार गढ़ा। अध्ययन द्वितीयक स्रोतों—ऐतिहासिक ग्रंथों, पुरातात्विक विवरणों तथा समकालीन विद्वानों की टिप्पणियों—पर आधारित है। निष्कर्षतः पाया गया कि अकबर की धार्मिक-सांस्कृतिक समन्वय नीति (सुलह-ए-कुल) फतेहपुर सीकरी में पाषाण रूप में साकार हुई; जहाँगीर काल स्थापत्य की दृष्टि से अपेक्षाकृत मंद रहा, किंतु बाग़-योजना तथा सजावटी तत्वों में विकास जारी रहा; और शाहजहाँ के काल में यह समन्वय संगमरमर, सममिति तथा पित्रा-दुरा शिल्प के माध्यम से अपने चरमोत्कर्ष—ताजमहल—तक पहुँचा। यह शोध यह तर्क प्रस्तुत करता है कि मुगल स्थापत्य कला वस्तुतः एक "समन्वित उपमहाद्वीपीय भाषा" (composite subcontinental idiom) थी, न कि केवल आयातित इस्लामी-फारसी शैली।
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